Saturday, 24 April 2010

शब्द जो बोलते नहीं पुकारते हैं .


ये कैसी अभिव्यक्ति है तुम्हारी,ये कैसी रचना है
निशब्द हो मौन खड़े क्यूँ ये कैसी विडम्बना है
शब्द ने शब्द ना होकर ये कैसा रूप ले लिया है
सरस्वती को लक्ष्मी बना दिया ये कैसी वंदना है ।

आज जिन पन्नो पर तुमने उम्मीदें लिखी होंगी
कल उन्ही पन्नो पर लम्बी सरहदें खिची होंगी
मैं ये नहीं कहता की मैं एक परिंदा हूं लेकिन
मेरे होंसलो की उड़ान तेरी सोच से ऊँची होगी ।

वो भाव मेरे,जो तुम्हारे मन में पल रहे थे
वो शब्द मेरे,जो तुम्हारे दर्द में ढल रहे थे
तुम मेरे जीवन की एक मूक कविता बन गई हो
वो विचार मेरे,जो तुम्हारे मस्तकपटल में चल रहे थे ।

बेरंग इन पन्नो पर कुछ सिलवटें बाकि हैं अभी
वक़्त जो खीच गया कुछ लकीरें,बाकि हैं अभी
मैं खुद को ही तन्हा ताउम्र देखता रहा लेकिन
तेरी किताब का कोरा पड़ा एक पन्ना भरना बाकि है अभी ।
अक्षय-मन

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