पूछो उन शर्मिंदा दीवारों से
पूछो उन बेगुन्हागारों से
जहाँ रोज़ मज़बूरी हो बेआबरू
जिस्म के उन तलबगारों से
हर रोज़ झुकती निगाह में
हर रोज़ बिकती वफ़ा में
मुझे बस अँधेरा ही दिखता
हर रोज़ लुटती सुबह में ....
मैं रोज़ यहाँ खिड़की से झाकती हूं
अपनी आज़ादी की दुआ मांगती हूं
हालातों ने कुछ इस कदर बाँधा मुझे
पायलों से जकड़ी बेसुध नाचती हूं
क्या मेरी कबूल कोई दुआ ना होगी
क्या इतनी ही काफी सजा ना होगी
मैं बेवफाई कितनी करूँ जिस्म से अपने
क्या रूह भी मेरी कभी खफा ना होगी
~अक्षय-मन
हालातों से श्रंगार कर
दुःख दर्द को होठों मे दबा
जब एक आह निकलती है
तो वहीँ बिस्तर पर
बिखरे बालों की तरह
बिखर जाते हैं
मेरे साथ सभी
मेरे वो दुःख दर्द भी
वाबजूद इसके
फिर से
नई चादर
नया ग्राहक
लेकिन
वही पुरानी
एक आह !!!
~अक्षय-मन