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Thursday, 8 September 2011

चीखते शब्द/भीगी नज़्म/कशमोकश




ये शब्द 
इन्हें ग़म तो तमाम 
दे देता हूं अपने 
पर बाद में क्यूँ 
सुनता नहीं 
उन पन्नो में दबी 
हुई इनकी चीखें 
जिसपर वक़्त ने गर्द की 
एक चादर चढ़ा दी है....
मेरी पहचान तलाशते वो शब्द 
अब खुद ही कहीं धूमिल हो गए 
पुराने वो शब्द पन्नो में दबी 
जिनकी चीखें 
वो गर्द,वो किताब
और वो बीता वक़्त 
सब भुलाकर नए शब्दों 
की तलाश मे 
बहुत स्वार्थी हो गया हूं मैं

भीगी नज़्म 


आंखें नम हैं तुम्हारी
सुर्ख ये पन्ने गीले
और शब्दों की बारिश
ऐसा लगता है जैसे
ख्यालों के आसमां में
दर्द की बिजलियाँ
कोंध सी गई हों
तुमने क्यूँ
नहीं भिगोया मुझे भी 

अपनी इन नज्मों की तरहां ??.


कशमोकश
मुझे अब एक अजीब सा डर
सताने लगा है
अजीब सी कशमोकश में हूं
अपने शब्दों में तुझे
कितना याद करता हूं मैं
लेकिन
अब तेरे वापस आने से डर लगता है मुझे
अब तू वापस नहीं आना कभी
तेरे आने से कहीं
ये शब्द ना रूठ जाये मुझसे
तेरे बिना जी पाने की
एक वजह ये शब्द ही हैं
मैं इनको अब कभी नहीं छोड़ पाउँगा !!!!




~~अक्षय-मन