Sunday, 24 October 2010

एहसास दूरियों का


1.
आंखें भीगी
पलकों में नमी सी है
न जाने क्यूँ ये लब
हंसी को कम

अश्को को ज्यादा चूमने लगे हैं...


2.
वो सफहा और मैं दोनों कोरे हैं
किसी दास्ताँ के लिए
सोचा एक दूसरे की तन्हाई बाँट लें..
उसे इक दास्ताँ मिल जाएगी और
मुझे भूली बिसरी कुछ यादें....

अब न वो सफहा कोरा है और न मैं तन्हा.....


3.
मौन था मन ,ह्रदय निस्पंद
झुके हैं चक्षु ,मंजुकपोल
और वो न जाने क्यूँ
छुपाते रहे सूखे पड़े उन
अधरों की सुर्ख़ियों में

वो ढाई आखर प्रेम के.....

4.
रातों को करवट लेते हुए तुझे न पाता हूँ
जानता हूँ अब तू मेरे पास नहीं है मगर
तेरी यादों को समेटती

इस चादर की सिलवटें

अब भी मेरे साथ सोती हैं.....

अक्षय-मन
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