Saturday, 7 July 2012

मैं बदलते युग का उत्थान हूं




खुद पर ही करता  मैं अभिमान हूं 
मैं बदलते युग का हाँ उत्थान  . हूं 

सपन्न सभी जो बह चुके हैं नयन-नीर से 
अपने ह्रदय पर वार किये अपने ही तीर से 

पत्थरों में हाँ तराशा हूं खुद को 
बन रहा पत्थर या मैं भगवान् हूं 
खुद पर ही करता  मैं अभिमान हूं 
मैं बदलते युग का हाँ उत्थान  . हूं 

शोलों सी  जल रही हैं  आज सब दिशायें 
दिख रही हैं आज मुझको जिन्दा चितायें 

आएगी हाँ मौत बनकर आंधियां 
खड़ा रहा डटकर हाँ मैं चट्टान हूं 
खुद पर ही करता  मैं अभिमान हूं 
मैं बदलते युग का हाँ उत्थान  . हूं 

भूल चूका हूं सुर वो राग  वो गीत . सभी 
छोड़ चूका हूं प्यार वो साथ वो मीत सभी 

ये जीवन ही  बन जाये जब हाँ रणभूमि 
अंत से अपने लड़ रहा मैं लहू-लुहान हूं 
खुद पर ही करता  मैं अभिमान हूं 
मैं बदलते युग का हाँ उत्थान  . हूं 

देखो फेला हूं मैं सब संसार में
कहने को पर नहीं पर उड़ान हूं 

बादलों से गिर रही हैं जो बिजलियाँ 
छिप के रहना मुझसे में आसमान हूं 
खुद पर ही करता  मैं अभिमान हूं 
मैं बदलते युग का हाँ उत्थान  . हूं 

~~अक्षय-मन 
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