Saturday, 21 March 2009

कुछ मुक्तक

१.
उम्मीद की डोर बंधी है मेरे लहराते आँचल से
कोई झोका हवा का उसका पता पूछे गरजते बादल से
किसी को मालूम नही वो कहाँ है कैसा है कितना
दर्द है कितना इंतज़ार पूछो मेरे अश्क, मेरे काजल से ।
२.
सांसों को अपनी शब्दों का नाम देदो
क़यामत को इस कलम की पयाम देदो
तेरा क्या बिगाड़ पायेगा कोई
मौत को तुम अब मोहब्बत का काम देदो ।
३.
हर दरख्त,वो दुखती रग इक दुआ बन जायेगी
खुदा की रहनुमाई में छाव बन छा जायेगी
क्या बिगाड़ेगा कुछ नसीब अपना
शाख-शाख जब होंसलों की अस्ल बन जायेगी ।
४.

कोई चहरा इन निगाहों से बच नही सकता
सच झूठ का फ़ैसला एक रात में हो नही सकता
मैं जानकर भी अनजान हूं तेरे चहेरे की लकीरों से
छुपा  गया जो तू मुझसे राज वो गहरा हो नहीं सकता 



५.
जाओगे तुम जहाँ हमारा पथ वही है
सारथी हैं हम-तुम ये रथ भी वही है
चिरागों के बुझने से राहें नही खोती
विश्वास की राह जो चले सच्चा पथिक वही है ।
अक्षय-मन
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