Wednesday, 17 December 2008

अनाथ


भूख फिर जागी है उन अंधेरों में
एक रोता अलाप लिए वो तुमसे
कहना चाहती है मुझे उस आँचल
का एहसास करा दो जो कभी मुझपर
नही गिरा मुझे ये बतादो की मैं कौन हूं?
आज मैं ख़ुद को ढूढ़ रहा हूं कभी किसी माँ
के आँचल में कभी इन चलती राहों में तो कभी मुझे
मिली फटकार से तो कभी मुझे मिली गालियों से....
मैं ख़ुद को एक अनजानी सी पहचान देता हूं ....
बचपन से अब तक ख़ुद को ही तो देखता आया हूं
कभी किसी ने मुझे नही देखा मैं कोई ग्रहण तो नही
जो मुझे देखने से भी तुम अंधे हो जाओगे ....
मैं कोई आग तो नही जो मुझे छुने से तुम जल जाओगे
मुझे मालूम है तुममे से ही कोई एक है मेरा बाप,मेरी मां
लेकिन अब तो वो भी नही पहचानेगे
क्यूंकि इस अश्लीलता के बाज़ार में मुझे लोग अनाथ बुलाते हैं.....
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