Saturday, 7 July 2012

मैं बदलते युग का उत्थान हूं



खुद पर ही करता  मैं अभिमान हूं 
मैं बदलते युग का हाँ उत्थान  . हूं 

सपन्न सभी जो बह चुके हैं नयन-नीर से 
अपने ह्रदय पर वार किये अपने ही तीर से 

पत्थरों में हाँ तराशा हूं खुद को 
बन रहा पत्थर या मैं भगवान् हूं 
खुद पर ही करता  मैं अभिमान हूं 
मैं बदलते युग का हाँ उत्थान  . हूं 

शोलों सी  जल रही हैं  आज सब दिशायें 
दिख रही हैं आज मुझको जिन्दा चितायें 

आएगी हाँ मौत बनकर आंधियां 
खड़ा रहा डटकर हाँ मैं चट्टान हूं 
खुद पर ही करता  मैं अभिमान हूं 
मैं बदलते युग का हाँ उत्थान  . हूं 

भूल चूका हूं सुर वो राग  वो गीत . सभी 
छोड़ चूका हूं प्यार वो साथ वो मीत सभी 

ये जीवन ही  बन जाये जब हाँ रणभूमि 
अंत से अपने लड़ रहा मैं लहू-लुहान हूं 
खुद पर ही करता  मैं अभिमान हूं 
मैं बदलते युग का हाँ उत्थान  . हूं 

देखो फेला हूं मैं सब संसार में
कहने को पर नहीं पर उड़ान हूं 

बादलों से गिर रही हैं जो बिजलियाँ 
छिप के रहना मुझसे मैं आसमान हूं 
खुद पर ही करता  मैं अभिमान हूं 
मैं बदलते युग का हाँ उत्थान  . हूं 

~~अक्षय-मन 
 © copyright 

Friday, 30 March 2012

लिख रहा हूं

किसी की आँखों की नमी लिख रहा हूं 
बेजान उन अश्कों की गमी लिख रहा हूं  


खिलते नहीं हैं फूल अब इस गुलशन में 
अपने नाम कुछ बंजर ज़मीं लिख रहा हूं  


मिलने को मिल जाये कायनात सारी 
   तू जो नहीं है,तेरी कमी लिख रहा हूं..... 
बेजान उन अश्कों की गमी लिख रहा हूं 
  अपने नाम कुछ बंजर ज़मीं लिख रहा हूं  
~~~अक्षय-मन

Thursday, 8 September 2011

चीखते शब्द/भीगी नज़्म/कशमोकश




ये शब्द 
इन्हें ग़म तो तमाम 
दे देता हूं अपने 
पर बाद में क्यूँ 
सुनता नहीं 
उन पन्नो में दबी 
हुई इनकी चीखें 
जिसपर वक़्त ने गर्द की 
एक चादर चढ़ा दी है....
मेरी पहचान तलाशते वो शब्द 
अब खुद ही कहीं धूमिल हो गए 
पुराने वो शब्द पन्नो में दबी 
जिनकी चीखें 
वो गर्द,वो किताब
और वो बीता वक़्त 
सब भुलाकर नए शब्दों 
की तलाश मे 
बहुत स्वार्थी हो गया हूं मैं

भीगी नज़्म 


आंखें नम हैं तुम्हारी
सुर्ख ये पन्ने गीले
और शब्दों की बारिश
ऐसा लगता है जैसे
ख्यालों के आसमां में
दर्द की बिजलियाँ
कोंध सी गई हों
तुमने क्यूँ
नहीं भिगोया मुझे भी 

अपनी इन नज्मों की तरहां ??.


कशमोकश
मुझे अब एक अजीब सा डर
सताने लगा है
अजीब सी कशमोकश में हूं
अपने शब्दों में तुझे
कितना याद करता हूं मैं
लेकिन
अब तेरे वापस आने से डर लगता है मुझे
अब तू वापस नहीं आना कभी
तेरे आने से कहीं
ये शब्द ना रूठ जाये मुझसे
तेरे बिना जी पाने की
एक वजह ये शब्द ही हैं
मैं इनको अब कभी नहीं छोड़ पाउँगा !!!!




~~अक्षय-मन