Sunday, 14 August 2011

मैं टुकड़ों टुकड़ों में बना हूं


मैं टुकड़ों टुकड़ों में बना हूं
कभी हालातों ने ढाला मुझे
कभी मजबूरियों में पला हूं
मैं टुकड़ों टुकड़ों में बना हूं

बेजान जिस्म में भूख जिन्दा है
एक पकी रोटी की आस में
मैं हर रोज़ जला हूं
मैं टुकडो टुकड़ों में बना हूं

मेरे फटे हाल पर हर रोज़
पेबंद लगा जाता है ये वक़्त
मैं इन चिथड़ों से ढका हूं
मैं टुकडो टुकडो में बना हूं

दर्द की वो किरचें दिखती
होंगी अध्नग्न जिस्म पर
बस वहीँ हैं उन्ही से बना हूं
मैं टुकड़ों टुकड़ों में बना हूं
मैं टुकड़ों टुकड़ों में बना हूं

अक्षय-मन

दुखों की तान पर गरीबी अपना राग सुनाती है
कुछ नहीं तो ऐसे ही पेट की आग बुझाती है !!!
 

हर पल एक नया दर्द  मिलता है उसे बस
उसी दर्द को ही अपना अनुराग बनाती है 

दुखों की तान पर गरीबी अपना राग सुनाती है
कुछ नहीं तो ऐसे ही पेट की आग बुझाती है !!!
 



अक्षय-मन
Post a Comment