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Wednesday, 13 October 2010

कृति एक कल्पना !!!

एक मर्म और मन का अल्प अँधेरा
किसी कल्पना को जन्म देता है
एक ऐसी कल्पना जो अभी निर्मल-नवीन है
इस संसार से अछुती है

समय के साथ वो कल्पना पलती रही
विचारों के पालने में
उसको समेट लिया अपनी गोद में
कुछ अधूरे बिखरे पन्नो ने

किसी ने उसे अवांछित कहा तो
कोई अवहेलना करके चल दिया परन्तु
विचारों की धुरी पर वो कल्पना
अपना निश्चित रूप ले रही थी

व्यथा के पथ पर
आसीमित गहराईयों को छूती वो कल्पना
शब्दों से श्रृंगार कर
अब एक अक्षय कृति बन गई है
।
अक्षय-मन